उत्तराखंड के वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, मुख्य सचिव ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर किया रवाना

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चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल से प्रदेश में ग्लेशियल झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की शुरुआत की जा रही है। इसके लिए मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वसुंधरा ताल में निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए जा रहे वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

उन्होंने कहा कि यह पहल आने वाले समय में ग्लाॅफ के खतरों को कम करने तथा जोखिम को समझने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और वास्तविक समय में आंकड़ों की निगरानी से ग्लेशियल झीलों में होने वाले परिवर्तनों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी।

अभियान दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के 12 सदस्य और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के 2 वैज्ञानिक शामिल है। उच्च हिमालयी एवं दुर्गम क्षेत्र में अभियान दल की सुरक्षा, आवागमन और फील्ड सहयोग के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान भी दल के साथ रहेंगे।

इन उपकरणों से होगी वसुंधरा ताल की निगरानी

  1. जलस्तर सेंसर-झील के जलस्तर में उतार-चढ़ाव एवं असामान्य परिवर्तनों की निगरानी।
  2. स्वचालित मौसम केंद्र-तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा की गति एवं दिशा, वायुदाब तथा प्रकाश की तीव्रता का मापन।
  3. स्नो डेप्त सेंसर-झील के आसपास बर्फ की गहराई में होने वाले बदलावों की निगरानी।
  4. स्नो सब सरफेस टेंपरेचर सेंसर-बर्फ की विभिन्न गहराइयों पर तापमान में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए आठ सेंसर।
  5. टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर-चयनित स्थानों पर झुकाव, कंपन एवं हलचल की निगरानी।
  6. जल प्रवाह सेंसर-जल प्रवाह में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी।
  7. सौर ऊर्जा प्रणाली-दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में उपकरणों को विद्युत आपूर्ति।
  8. उपग्रह संचार प्रणाली-मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में आंकड़ों को बेस स्टेशन तक भेजने की व्यवस्था।
  9. डेटा लॉगर एवं मॉनिटरिंग डैशबोर्ड-प्राप्त आंकड़ों का रिकॉर्ड, ऑनलाइन प्रदर्शन तथा निर्धारित थ्रेशोल्ड के आधार पर अलर्ट जनरेशन।